Ajit Doval China Visit: भारत और चीन के रिश्तों में लंबे समय से चली आ रही तल्खी के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल चीन पहुंच रहे हैं। बीजिंग में वह चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत के 25वें दौर में शामिल होंगे। बैठक का केंद्र भारत-चीन सीमा विवाद रहेगा, लेकिन इसकी अहमियत केवल सीमा तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के बीच रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिश भी इस वार्ता के पीछे बड़ा उद्देश्य है।
LAC पर शांति सबसे बड़ी प्राथमिकता

बातचीत में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC की स्थिति पर खास ध्यान रहने की उम्मीद है। 2020 में गलवान घाटी की घटना के बाद दोनों देशों के बीच पैदा हुआ तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में दोनों पक्ष यह सुनिश्चित करने पर जोर दे सकते हैं कि सीमा पर कोई नया टकराव न हो और सैनिकों के बीच भरोसा बहाल करने की प्रक्रिया आगे बढ़े।
मौजूदा हालात की समीक्षा के दौरान अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी क्षेत्र में चीनी गतिविधियों से जुड़ी हालिया खबरों का मुद्दा भी उठ सकता है। भारत के लिए सीमा पर जमीनी स्थिति स्पष्ट रखना इस बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
3,488 किलोमीटर की सीमा का विवाद आसान नहीं
भारत और चीन के बीच करीब 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर विवाद कई दशकों से चला आ रहा है। विशेष प्रतिनिधि वार्ता का उद्देश्य इसी जटिल विवाद के राजनीतिक समाधान की संभावनाओं को तलाशना है। इस बार चर्चा में तत्काल तनाव रोकने के साथ-साथ भविष्य के लिए स्थायी सीमा प्रबंधन व्यवस्था तैयार करने पर भी जोर संभव है।
अक्टूबर 2024 के समझौते की होगी समीक्षा
डोभाल और वांग यी के बीच बातचीत में अक्टूबर 2024 में सैनिकों की वापसी को लेकर बनी सहमति के बाद की स्थिति पर भी चर्चा हो सकती है। दोनों देश यह देख सकते हैं कि अब तक तनाव घटाने के लिए उठाए गए कदम कितने प्रभावी रहे हैं और आगे किन क्षेत्रों में अतिरिक्त प्रयास की जरूरत है।
गलवान के बाद प्रभावित हुई पेट्रोलिंग व्यवस्था को सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ना भी अहम मुद्दा माना जा रहा है। सीमा पर भरोसा कायम किए बिना व्यापक रिश्तों में सुधार की राह आसान नहीं होगी।
सीमा तय करने की दिशा में भी बढ़ सकता है कदम
सीमा विवाद के स्थायी समाधान की दिशा में विशेषज्ञ स्तर पर काम बढ़ाने का मुद्दा भी वार्ता में जगह पा सकता है। WMCC के तहत गठित विशेषज्ञ समूह संबंधित इलाकों की स्थिति और सीमा निर्धारण से जुड़े शुरुआती पहलुओं पर काम कर सकता है। हालांकि, सीमा विवाद का अंतिम समाधान लंबी और जटिल प्रक्रिया है।
सीमा प्रबंधन का तंत्र मजबूत करने पर जोर
दोनों देशों के बीच केवल राजनीतिक बातचीत ही नहीं, बल्कि सैन्य स्तर पर संवाद को भी मजबूत करने की जरूरत महसूस की जाती रही है। पश्चिमी सेक्टर में मौजूद व्यवस्थाओं के अलावा पूर्वी और मध्य सेक्टर में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच संपर्क व्यवस्था को बेहतर बनाने पर चर्चा संभव है।
इसका मकसद सीमा पर किसी अप्रत्याशित स्थिति को बड़ा विवाद बनने से पहले बातचीत के जरिए संभालना है। साथ ही 2005 में तय किए गए राजनीतिक पैरामीटर और मार्गदर्शक सिद्धांतों के आधार पर आगे की बातचीत को गति देने की संभावना भी तलाशी जा सकती है।
शी जिनपिंग के संभावित भारत दौरे से पहले क्यों अहम है बैठक?
डोभाल-वांग वार्ता का समय इसे और महत्वपूर्ण बना देता है। सितंबर में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले भारत और चीन के बीच सकारात्मक माहौल तैयार करने की कोशिश के तौर पर भी इसे देखा जा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि उनके दौरे की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
अगर जिनपिंग भारत आते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी संभावित मुलाकात दोनों देशों के रिश्तों के लिए बड़ा राजनीतिक संकेत हो सकती है। दोनों नेताओं की पिछली आमने-सामने मुलाकात अगस्त 2025 में तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन के दौरान हुई थी।
सीमा से आगे रिश्तों की राह तलाशेगा भारत
ऐसे में डोभाल और वांग यी की बैठक को केवल सीमा विवाद की एक और वार्ता के रूप में देखना उचित नहीं होगा। LAC पर स्थिरता, सैन्य संवाद, पेट्रोलिंग और सीमा विवाद के साथ-साथ यह बातचीत भारत-चीन संबंधों को अगले चरण में ले जाने की जमीन तैयार कर सकती है। अब निगाह इस बात पर होगी कि बीजिंग में होने वाली वार्ता से दोनों देशों के बीच भरोसा बहाली की प्रक्रिया कितनी आगे बढ़ती है।










