Raebareli: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रायबरेली आगमन के दौरान शहर में लागू की गई ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर आम जनता की परेशानियां एक बार फिर सामने आ गईं। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के चलते जगह-जगह यातायात प्रतिबंध और रूट डायवर्जन के कारण लोगों को जाम की समस्या से जूझना पड़ा। इसी दौरान एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने पुलिस की कार्यशैली और आम नागरिकों के साथ उसके व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया जा रहा है कि जाम में फंसे एक राहगीर ने यातायात व्यवस्था को लेकर अपनी बात रखने की कोशिश की। आरोप है कि उसकी बात सुनने अथवा स्थिति समझने के बजाय ट्रैफिक ड्यूटी पर तैनात एक सब-इंस्पेक्टर अचानक उस राहगीर को मारने के लिए दौड़ पड़े। पुलिसकर्मी के इस कथित आक्रामक व्यवहार से मौके पर मौजूद लोगों में भी नाराजगी दिखाई दी।

मामले का सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि राहगीर की ओर बढ़ते समय संबंधित सब-इंस्पेक्टर ने अपने चेहरे पर कपड़ा लगा लिया। इससे पुलिसकर्मी की पहचान छिपाने की कोशिश को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह है कि यदि पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी और कार्रवाई को लेकर पूरी तरह कानून के दायरे में था तो चेहरे को ढकने की जरूरत क्यों पड़ी?
जनता की आवाज सुनने के बजाय डंडे और दबाव का आरोप
मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी यातायात को सुचारु बनाए रखने के साथ-साथ आम नागरिकों को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल उपलब्ध कराने की भी होती है। लेकिन इस घटना ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जाम में परेशान नागरिक द्वारा अपनी बात रखना भी अब पुलिस की नजर में अपराध माना जाने लगा है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि संबंधित सब-इंस्पेक्टर पर पहले भी आम जनता के साथ कथित तौर पर दबाव बनाने और सख्त रवैया अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लोगों का कहना है कि यदि किसी पुलिसकर्मी के व्यवहार को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती हैं तो उच्च अधिकारियों को निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।
पुलिस की वर्दी पर सवाल, अधिकारियों की चुप्पी पर भी निशाना
घटना सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर है। कानून-व्यवस्था संभालने वाली पुलिस से आम नागरिकों को सुरक्षा और संयम की उम्मीद होती है। यदि ड्यूटी के दौरान कोई पुलिसकर्मी किसी राहगीर पर हाथ उठाने या मारपीट करने के लिए दौड़ता दिखाई देता है, तो उसकी जांच होना जरूरी है।
सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो सामने आने के बाद लोगों में चर्चा तेज है कि पुलिस की वर्दी अधिकार का प्रतीक जरूर है, लेकिन यह अधिकार नागरिकों को डराने या उनकी आवाज दबाने का लाइसेंस नहीं हो सकता।
‘मुंह ढककर कार्रवाई’ ने बढ़ाए सवाल
सबसे ज्यादा चर्चा पुलिसकर्मी द्वारा कथित तौर पर अपना चेहरा ढकने को लेकर है। आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी को अपनी पहचान छिपाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। कुछ लोगों ने इस दृश्य की तुलना पत्थरबाजी के दौरान पहचान छिपाने की कोशिश से भी की है, हालांकि ऐसी तुलना को तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
मुद्दा सीधा है—यदि पुलिसकर्मी ने नियमों के तहत कार्रवाई की, तो चेहरा छिपाने की जरूरत क्यों पड़ी और यदि कार्रवाई गलत थी तो उसके खिलाफ विभागीय जांच कब होगी?
उच्च अधिकारियों से जांच और कार्रवाई की मांग
घटना के बाद स्थानीय लोगों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि वीडियो में दिखाई दे रहा व्यक्ति वास्तव में ट्रैफिक पुलिस का सब-इंस्पेक्टर है और उसने राहगीर को मारने का प्रयास किया है, तो उसकी भूमिका की जांच कर विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए।
मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर आम जनता की आवाज दबाने की कोशिश किसी भी स्थिति में उचित नहीं मानी जा सकती। यातायात व्यवस्था संभालना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन जनता के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
अब देखना यह है कि वायरल वीडियो और लगाए गए आरोपों पर रायबरेली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी संज्ञान लेते हैं या फिर यह मामला भी पुलिस महकमे की फाइलों में दबकर रह जाएगा।










