Asansol Durga Puja: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का नाम आते ही भव्य पंडालों, आकर्षक प्रतिमाओं और कई दिनों तक चलने वाले उत्सव की तस्वीर सामने आ जाती है। लेकिन आसनसोल के हीरापुर इलाके में दामोदर नदी के किनारे स्थित कालीकृष्ण आश्रम की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां मां दुर्गा के आगमन का उत्सव महालया के दिन ही मनाया जाता है और पंचमी से लेकर दशमी तक की धार्मिक रस्में एक ही दिन में पूरी कर ली जाती हैं। पूजा के साथ प्रतिमा विसर्जन भी उसी दिन होता है। यही विशेषता इस आश्रम को दुर्गा पूजा की परंपराओं के बीच अलग पहचान दिलाती है।
महालया पर ही सिमट जाता है कई दिनों का दुर्गोत्सव

आम तौर पर दुर्गा पूजा में महालया के बाद षष्ठी से उत्सव की शुरुआत होती है और विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इसके विपरीत, हीरापुर के धेनुआ गांव में स्थित कालीकृष्ण आश्रम में पूरा धार्मिक आयोजन महालया पर ही संपन्न हो जाता है। यहां पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी से जुड़ी रस्में निर्धारित परंपरा के अनुसार एक ही दिन निभाई जाती हैं। पूजा और विसर्जन एक साथ होने के कारण आश्रम में उत्सव का स्वरूप दूसरे पूजा स्थलों से काफी अलग दिखाई देता है।
मां दुर्गा के साथ विराजती हैं जया और विजया
इस आश्रम की दुर्गा पूजा की एक और खास बात प्रतिमा की बनावट है। आमतौर पर मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। मगर कालीकृष्ण आश्रम में मां दुर्गा के साथ उनकी दो सहेलियों जया और विजया को स्थान दिया जाता है। यह अनूठी धार्मिक परंपरा श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। महालया के दिन यहां पहुंचने वाले भक्त पूजा-अर्चना में शामिल होते हैं और इस विशिष्ट स्वरूप के दर्शन करते हैं।
संत तेजानंद ब्रह्मचारी से जुड़ी है शुरुआत की कहानी
स्थानीय लोगों के अनुसार, कालीकृष्ण आश्रम की स्थापना वर्ष 1937 में संत तेजानंद ब्रह्मचारी ने दामोदर नदी के किनारे की थी। बताया जाता है कि वर्ष 1979 में देवी से जुड़े स्वप्न में मिले संदेश के बाद उन्होंने एक ही दिन दुर्गा पूजा करने की परंपरा शुरू की। तभी से आश्रम में महालया के अवसर पर ‘आगमन दुर्गा पूजा’ आयोजित की जाती है।
दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु
कालीकृष्ण आश्रम में महालया के दिन सुबह से ही पूजा की तैयारियां और धार्मिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। दिनभर चलने वाले आयोजन में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की जाती है। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में इस तरह एक ही दिन पूजा और विसर्जन की परंपरा बहुत कम देखने को मिलती है। असम के कुछ स्थानों पर भी ऐसी पूजा होने की बात कही जाती है।
आस्था और परंपरा ने दिलाई अलग पहचान
कालीकृष्ण आश्रम की ‘आगमन दुर्गा पूजा’ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही मान्यता और स्थानीय सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक भी है। जहां दूसरे स्थानों पर दुर्गोत्सव कई दिनों तक चलता है, वहीं यहां महालया के दिन ही पूजा से लेकर विसर्जन तक की यात्रा पूरी हो जाती है। इसी विशिष्ट परंपरा के कारण हीरापुर का यह आश्रम हर साल श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनता है।










