Raebareli: किसी के घर में दीपावली की रात दीये जगमगाएंगे, कहीं पकवान बनेंगे तो कहीं बच्चे नए कपड़े पहनकर खुशियां मनाएंगे। घरों में अपनों के साथ हंसी-खुशी का माहौल होगा, लेकिन इसी त्योहार पर 80 साल की गंगादेई की जिंदगी में अंधेरा पसरा है। जिस उम्र में उन्हें अपनों के सहारे और दो वक्त की रोटी के साथ सुकून से जिंदगी बितानी चाहिए, उस उम्र में वह रेलवे स्टेशन पर जिंदगी के दिन काटने को मजबूर हैं। न अपना घर बचा, न सिर पर छत है और न ही कोई ऐसा सहारा, जिसके भरोसे वह दीपावली की खुशियां मना सकें। दूसरों के घरों को रोशनी से जगमगाता देखकर शायद उनके मन में भी अपने उजड़े आशियाने की यादें ताजा हो जाती होंगी।
जायस निवासी गंगादेई की जिंदगी का दर्द किसी एक दिन की परेशानी नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष की कहानी है। बताया जाता है कि उनके पति उन्हें छोड़कर चले गए थे। पति का साथ छूटने के बाद उन्होंने किसी तरह जिंदगी की गाड़ी खींची। समय बीतता गया और बेटा-बहू ही उनके जीवन का सहारा बने,लेकिन परिवार की आर्थिक जरूरतों ने उन्हें भी रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाने को मजबूर कर दिया। इसके बाद बुजुर्ग महिला की मुश्किलें और बढ़ गईं।

अभी वह परिवार से दूर रहने का दर्द झेल ही रही थीं कि बारिश ने उनकी बची-खुची जिंदगी को भी मुश्किल में डाल दिया। उसने बताया कि बारिश के दौरान उनका कच्चा मकान ढह गया है जिस घर की दीवारों के बीच उन्होंने अपनी जिंदगी के कई साल गुजारे थे, वह एक झटके में मलबे में तब्दील हो गया। मकान गिरने के बाद उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि अब जाएं तो जाएं कहां? उम्र के इस पड़ाव पर न नया घर बनाने की ताकत है और न ही कहीं और रहने का कोई इंतजाम नहीं है।
स्टेशन की बेंच और खुला आसमान बना ठिकाना
घर उजड़ने के बाद रायबरेली रेलवे स्टेशन ही उनके लिए सहारा बन गया। अब स्टेशन की बेंच और आसपास की जगह पर ही उनका समय गुजरता है। यात्रियों की आवाजाही, ट्रेनों की आवाज और अनजान चेहरों के बीच वह अपनी जिंदगी के दिन काट रही हैं। स्टेशन पर आने-जाने वाले लोग अपने गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी में रहते हैं, लेकिन गंगादेई के सामने तो कहीं पहुंचने का रास्ता ही नहीं है। उनके लिए यही स्टेशन फिलहाल घर बन गया है।
दूसरों के घर जलेंगे दीये, गंगादेई के हिस्से में रहेगा अंधेरा
दीपावली पर जब हर घर में लक्ष्मी-गणेश की पूजा होगी, बच्चे पटाखे चलाएंगे और परिवार एक साथ बैठकर त्योहार मनाएंगे, तब गंगादेई के सामने अपने जीवन की बेबसी होगी। न आंगन है, जहां दीपक जला सकें और न कोई कमरा, जहां ठंड और बारिश से बच सकें। दूसरों के घरों में रोशनी देखकर उनके मन में अपने घर की यादें जरूर उठती होंगी। जिस उम्र में किसी बुजुर्ग को परिवार के साथ त्योहार मनाने का हक और सुकून मिलना चाहिए, उस उम्र में उन्हें एक सुरक्षित ठिकाने की तलाश है।
गंगादेई की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की बेबसी नहीं, बल्कि समाज और जिम्मेदार व्यवस्था के सामने खड़ा एक सवाल भी है। आखिर उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें सहारा कौन देगा? क्या उन्हें एक अदद छत और सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? दीपावली पर घर-घर रोशनी करने के बीच गंगादेई की जिंदगी का अंधेरा दूर करने के लिए किसी मददगार हाथ का इंतजार है।










