Global E-Waste Crisis: 43% रीसाइक्लिंग के बावजूद क्यों बढ़ रहा है ज़हरीला इलेक्ट्रॉनिक कचरा?

Global E-Waste Crisis: टेक्नोलॉजी युग में क्यों गहराता जा रहा है इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट का खतरा?

Global E-Waste Crisis: तेजी से बढ़ती टेक्नोलॉजी और हर साल बदलते गैजेट्स ने दुनिया के सामने एक नई पर्यावरणीय चुनौती खड़ी कर दी है—ई-वेस्ट की। स्मार्टफोन से लेकर टीवी और लैपटॉप तक, हर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण समय बीतने के साथ कचरे में बदल रहा है और यह कचरा अब पृथ्वी के लिए विषैला बोझ बन चुका है। भारत, जो अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक है, रीसाइक्लिंग दर में सुधार के बावजूद इस संकट से जूझ रहा है। 43% औपचारिक रीसाइक्लिंग के बाद भी हर साल इलेक्ट्रॉनिक कचरे की मात्रा बढ़ती जा रही है और कारण सिर्फ उपभोग नहीं, बल्कि सिस्टम की कमियाँ भी हैं। इस बीच PRS इंडिया और BRS 2025 में विशेषज्ञों ने समाधान पर चर्चा की, लेकिन सवाल वही है कि समस्या बढ़ क्यों रही है?

ई-वेस्ट क्यों बन रहा है दुनिया के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा?/Global E-Waste Crisis

दुनिया जिस तेज़ी से टेक्नोलॉजी पर निर्भर होती जा रही है, उसी रफ्तार से ई-वेस्ट का पहाड़ भी बढ़ता जा रहा है। हर साल लाखों नए स्मार्टफोन, कंप्यूटर, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बाजार में लॉन्च होते हैं, लेकिन उनके पुराने वर्ज़न कचरे में तब्दील होकर पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। हानिकारक रसायन, भारी धातुएं और विषैले तत्व मिट्टी, हवा और भूजल को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहे हैं। भारत (India) के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि देश अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक बन चुका है। इंसानी विकास और तकनीकी उन्नति जितनी तेजी से आगे बढ़ी, ई-वेस्ट प्रबंधन की क्षमता उतनी नहीं बढ़ पाई। यही अंतर अब पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए संकट बना हुआ है।

उत्पादन बढ़ा, रीसाइक्लिंग पीछे छूटी

भारत में ई-वेस्ट उत्पादन की रफ्तार चौंकाने वाली है। 2023–24 में 1.751 मिलियन मीट्रिक टन ई-वेस्ट उत्पन्न हुआ, जो 2019–20 की तुलना में 73% अधिक है। इसके बावजूद केवल 43% कचरे को ही औपचारिक रूप से रीसाइकल किया जा सका। शेष कचरा अनौपचारिक सेक्टर में चला जाता है, जहां बिना सुरक्षा मानकों के रीसाइक्लिंग से भारी प्रदूषण फैलता है। यही मुद्दा मुंबई (Mumbai) के बॉम्बे एग्ज़िबिशन सेंटर में आयोजित PRS इंडिया और BRS 2025 सम्मेलन में प्रमुख रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में तकनीक, ज्ञान और क्षमता मौजूद होने के बावजूद एक मजबूत, केंद्रीकृत रीसाइक्लिंग प्रणाली का अभाव संकट को और गहरा कर रहा है। कच्चे माल की कमी और अनियमित कलेक्शन सिस्टम भी बड़ी बाधाएं हैं।

निवेश से क्षमता तक बड़ी खामियां

भारत (Bharat) में रीसाइक्लिंग उद्योग (Recycling Industry) को भविष्य की अर्थव्यवस्था का अहम स्तंभ माना जा रहा है। मैटेरियल रीसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया का मानना है कि ई-वेस्ट, प्लास्टिक, धातु, टायर और बैटरी जैसे सेक्टरों में सुधार हुआ है, लेकिन चुनौतियाँ अब भी गंभीर रूप से मौजूद हैं। प्लास्टिक रीसाइक्लिंग में भरोसेमंद डेटा और संगठित संरचना की कमी सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है। जस्ते (Zinc) जैसी धातुओं की रीसाइक्लिंग दर सिर्फ 10% है, जो वास्तविक क्षमता से बहुत कम है। ई-वेस्ट सेक्टर में केवल 5% कचरा ही औपचारिक रूप से रीसाइक्लिंग इकाइयों तक पहुंच पाता है, जबकि भारत के पास सोना, चांदी, लिथियम और कोबाल्ट जैसी मूल्यवान धातुएं निकालने की तकनीक मौजूद है। उद्योग में अब तक 2,500 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है, जबकि विशेषज्ञ कहते हैं कि इसे मजबूत करने के लिए 50,000 करोड़ रुपये की जरूरत है।

समाधान की राह कहाँ है?

पर्यावरण संरक्षण के मामले में महाराष्ट्र (Maharashtra) कई राज्यों से आगे है। एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने वाला यह देश का पहला राज्य था। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) सरकार के साथ मिलकर ऐसे इनक्यूबेशन हब तैयार कर रहा है, जो रीसाइक्लिंग से जुड़े स्टार्टअप्स को बढ़ावा देंगे। भारत के सबसे बड़े ई-वेस्ट उत्पादक शहर मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता- कुल कचरे का 60% हिस्सा पैदा करते हैं, इसलिए राज्यों के लिए ठोस मॉडल की जरूरत और भी बढ़ जाती है। वैश्विक स्तर पर, EU का WEEE डायरेक्टिव और ROHS नियम जिम्मेदार रीसाइक्लिंग के सफल उदाहरण हैं। अमेरिका (USA) में कैलिफ़ोर्निया मॉडल, चीन (China) की विदेशी ई-वेस्ट पर रोक, और जापान (Japan) के 2001 रीसाइक्लिंग कानून ने कचरे के निपटान को नई दिशा दी है। भारत भी इन मॉडलों से सीखकर एक प्रभावी और मजबूत ई-वेस्ट प्रबंधन प्रणाली विकसित कर सकता है।

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