Raebareli: बछरावां BEO कार्यालय की अनियमितताओं पर डीएम सख्त, डीसी मनरेगा को सौंपी जांच

Raebareli: सेवा पुस्तिकाओं के गायब होने से लेकर अवैध संबद्धता तक के आरोपों से शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप

रायबरेली (Raebareli) जिले के बछरावां खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) कार्यालय में सामने आए कथित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के मामलों ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लंबे समय से मिल रही शिकायतों और उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के बावजूद कार्रवाई न होने पर जिलाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लिया है। जिलाधिकारी ने पूरे प्रकरण की जांच डीसी मनरेगा एवं प्रभारी खंड विकास अधिकारी बछरावां पी.एस. चंद्रौल को सौंप दी है। इस आदेश के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप की स्थिति बनी हुई है।

लंबे समय से उठ रही थीं शिकायतें

राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ का आरोप है कि पिछले करीब डेढ़ वर्ष से लगातार विभिन्न अनियमितताओं की शिकायतें की जा रही थीं। संगठन द्वारा कई बार विभागीय अधिकारियों को लिखित शिकायतें और संबंधित दस्तावेज भी उपलब्ध कराए गए, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।

महासंघ का कहना है कि पहले भी कुछ मामलों की जांच के लिए समितियां बनाई गई थीं, लेकिन उन समितियों ने गंभीर आरोपों की गहराई से जांच करने के बजाय केवल औपचारिकताएं पूरी कीं। आरोप है कि इससे अनियमितताओं में शामिल लोगों को संरक्षण मिलता रहा और मामले दबे रहे।

सेवा पुस्तिकाओं के गायब होने से बढ़ी चिंता

शिकायतों में सबसे गंभीर मामला शिक्षकों की सेवा पुस्तिकाओं के गायब होने का बताया जा रहा है। महासंघ के अनुसार प्राथमिक विद्यालय कुर्री की प्रधानाध्यापिका नीलम त्रिपाठी की मूल सेवा पुस्तिका वर्ष 2016 से कार्यालय से गायब है। जबकि विभाग की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि सभी अभिलेख सुरक्षित रखे गए हैं।

केवल एक सेवा पुस्तिका ही नहीं, बल्कि एक दर्जन से अधिक शिक्षक और शिक्षिकाओं की सेवा पुस्तिकाएं भी कार्यालय से लापता बताई जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज आखिर कहां गए और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी।

वेतन बहाली आदेश का रिकॉर्ड भी नहीं मिला

एक अन्य मामले में प्राथमिक विद्यालय मुबारकपुर सापों की प्रधानाध्यापिका रेनू सिंह से जुड़ा मामला भी सामने आया है। आरोप है कि वर्ष 2019 में जारी किया गया उनका वेतन बहाली आदेश आज तक उपलब्ध नहीं कराया गया है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि मूल आदेश और महत्वपूर्ण दस्तावेजों का गायब होना सामान्य लापरवाही नहीं माना जा सकता। इससे अभिलेखीय हेरफेर और साक्ष्यों को छिपाने जैसी आशंकाएं भी पैदा हो रही हैं। यही वजह है कि जांच में इस पहलू को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है।

रामपुर विद्यालय का मामला भी जांच के घेरे में

जांच के दायरे में प्राथमिक विद्यालय रामपुर का मामला भी शामिल किया गया है। आरोप है कि विद्यालय को बिना किसी सक्षम प्रशासनिक आदेश के बंद करा दिया गया था। इसके अलावा विद्यालय में हुए निर्माण कार्यों और विद्यालय प्रबंधन समिति (एसएमसी) के खाते से खर्च की गई सरकारी धनराशि का समायोजन या प्रत्यावर्तन आज तक नहीं किया गया।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस मामले में उच्चाधिकारियों द्वारा निर्देश दिए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इससे सरकारी धन के उपयोग और वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठ रहे हैं।

वर्षों तक शिक्षकों की रही कथित अवैध संबद्धता

कंपोजिट विद्यालय जीगों और उच्च प्राथमिक विद्यालय रानीखेड़ा में तैनात कुछ शिक्षकों को वर्षों तक बीईओ कार्यालय में संबद्ध रखे जाने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायत के अनुसार इन शिक्षकों की संबद्धता के लिए कोई सक्षम आदेश नहीं था, फिर भी वे कार्यालय में कार्य करते रहे।

आरोप है कि विद्यालयों में नियमित उपस्थिति न होने के बावजूद उनकी उपस्थिति प्रमाणित की जाती रही और उसी आधार पर वेतन का भुगतान भी होता रहा। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जाएगा।

बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ा असर

महासंघ का कहना है कि शिक्षकों की लंबे समय तक कार्यालय में संबद्धता का सीधा असर विद्यालयों में पढ़ाई पर पड़ा। जिन स्कूलों में शिक्षकों की आवश्यकता थी, वहां छात्रों को नियमित शिक्षण कार्य नहीं मिल सका।

शिकायत में कहा गया है कि इससे शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) की भावना प्रभावित हुई और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित होना पड़ा। यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि छात्रों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

बीईओ की आईडी से निरीक्षण कराने का आरोप

शिकायत में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है। बताया गया है कि एक शिक्षक द्वारा कथित रूप से बीईओ की आधिकारिक आईडी का उपयोग कर विद्यालयों का निरीक्षण किया गया। यदि जांच में यह आरोप सही साबित होता है तो इसे प्रशासनिक अधिकारों के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जाएगा।

इस आरोप ने विभागीय कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

पूर्व जांचों की निष्पक्षता पर भी उठे सवाल

राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने पहले की गई जांचों पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद नामित जांच अधिकारियों ने समयबद्ध कार्रवाई नहीं की।

महासंघ के अनुसार कई प्रकरण करीब पांच महीने तक लंबित रखे गए और जांच की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी की गई। इससे प्रशासनिक उदासीनता और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

निष्कर्ष

जिलाधिकारी द्वारा डीसी मनरेगा को जांच की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद शिक्षक समुदाय और शिकायतकर्ताओं में उम्मीद जगी है कि वर्षों से लंबित मामलों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होगी।

Other Latest News

Leave a Comment