Rewa Police corruption: रीवा शहर में पुलिस विभाग को लेकर एक बार फिर गंभीर चर्चा छिड़ गई है। कई पूर्व थानेदार, जो कुछ समय पहले शहर के थानों से ट्रांसफर होकर चले गए थे, अब लोगों की जुबान पर छाए हुए हैं। वजह उनकी संपत्ति में आई तेजी से बढ़ोतरी है। लोग कहते हैं कि ये अधिकारी पुरानी गाड़ियों में आते थे, लेकिन थोड़े ही समय में महंगी नई गाड़ियों में घूमने लगे। घर-दुकान, जमीन-जायदाद सब कुछ बढ़ता जा रहा है। ऐसे में आम जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं—यह सारी संपत्ति कहां से आई? क्या यह सिर्फ सैलरी और बचत से संभव है, या कोई और स्रोत है?
यह कोई नई बात नहीं है कि पुलिस की वर्दी में रहकर कुछ लोग गलत रास्ते चुन लेते हैं। लेकिन रीवा में यह चर्चा अब चाय की दुकानों से लेकर घर-घर तक पहुंच गई है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या सिस्टम में सब कुछ ठीक है? क्या ट्रांसफर होने वाले इन थानेदारों की जांच होनी चाहिए? क्योंकि अगर जांच हुई तो कई राज खुल सकते हैं। यह सिर्फ अफवाह नहीं, बल्कि लोगों की आंखों देखी हकीकत है जो सवाल खड़े कर रही है।

कफ सिरप तस्करी: देशभक्ति या सौदेबाजी?
रीवा में अब एक और बड़ा मुद्दा सामने आया है—नशीली कफ सिरप की तस्करी। यह वह सिरप है जो कोडीन जैसी नशीली दवाओं से बना होता है और युवाओं में नशे की लत फैला रहा है। पुलिस विभाग बार-बार दावा करता है कि वह नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
सूत्रों के मुताबिक, कफ सिरप के इस अवैध धंधे को संरक्षण देने के बदले एक प्रधान आरक्षक को करीब 1 करोड़ 26 लाख रुपये की भारी रकम मिली है। यह रकम इतनी बड़ी है कि कोई भी हैरान हो जाए। बताया जा रहा है कि यह सौदा उस समय हुआ जब रीवा में आईजी गौरव राजपूत ने पद संभाला और नशे पर सख्ती बरतने का ऐलान किया था।
आईजी गौरव राजपूत के नेतृत्व में कई बड़ी कार्रवाइयां हुईं। कई नशा तस्करों के सरगना और नेटवर्क के लोग जेल पहुंचे। हजारों बोतलें जब्त हुईं। लेकिन सवाल यह है कि जब ऊपर से इतनी सख्ती थी, तो नीचे स्तर पर यह धंधा कैसे चल रहा था? कौन लोग इसे भीतर से सहारा दे रहे थे?
पुलिस तंत्र के भीतर छिपा काला खेल
खबरों के अनुसार, कुछ अधीनस्थ पुलिसकर्मी और आरक्षक इस नेटवर्क को चुपके से मदद पहुंचाते रहे। एक थाना प्रभारी का नाम भी संदेह के घेरे में है। एक अन्य अधिकारी की भूमिका पर भी जल्द बड़ा खुलासा होने की बात कही जा रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इतनी कार्रवाइयों के बावजूद रीवा के अलग-अलग इलाकों में कफ सिरप की तस्करी आज भी जारी है। गांव-मोहल्लों तक यह नशा पहुंच रहा है।
इससे साफ जाहिर होता है कि नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कहीं न कहीं यह अभी भी सक्रिय है। क्या वर्दी के भीतर ही यह काला खेल चल रहा है? क्या कुछ अधिकारी “जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद” कर रहे हैं? सूत्र दावा करते हैं कि जिले से बाहर पदस्थ कुछ थाना प्रभारी भी इस धंधे से मोटी कमाई कर रहे हैं। अगर इनकी निष्पक्ष जांच हुई तो सारे सच सामने आ सकते हैं—दूध का दूध और पानी का पानी।
सिस्टम की साख पर सवाल
रीवा पुलिस में आईजी गौरव राजपूत जैसे अधिकारी नशे के खिलाफ ऑपरेशन प्रहार चला रहे हैं। वे खुले मंच से कह चुके हैं कि थानेदारों के बिना मिलीभगत के यह धंधा चल ही नहीं सकता। उनके पास ऐसी लिस्ट भी है। लेकिन फिर भी नीचे स्तर पर सौदेबाजी क्यों हो रही है? क्या ऊपर की सख्ती नीचे तक नहीं पहुंच रही?
यह मुद्दा सिर्फ पुलिस की साख का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। नशा युवाओं की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। परिवार बिखर रहे हैं। अगर पुलिस के कुछ लोग ही इसमें शामिल हैं, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? क्या यह देशभक्ति है या सौदेबाजी?










