Hul Diwas 2026: झारखंड के रामगढ़ जिले के वेस्ट बोकारो में मंगलवार को आदिवासी समाज ने हूल दिवस पूरे सम्मान, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया। हर वर्ष की तरह इस बार भी 30 जून को आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। समारोह का उद्देश्य केवल एक ऐतिहासिक विद्रोह को याद करना नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और बलिदान की विरासत से जोड़ना भी रहा।
झारखंड के रामगढ़ जिले के वेस्ट बोकारो में मंगलवार को आदिवासी समाज ने हूल दिवस पूरे सम्मान, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया। हर वर्ष की तरह इस बार भी 30 जून को आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। समारोह का उद्देश्य केवल एक ऐतिहासिक विद्रोह को याद करना नहीं था, बल्कि नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और बलिदान की विरासत से जोड़ना भी रहा।

‘हूल’ का अर्थ और संघर्ष की विरासत
संथाली भाषा में ‘हूल’ का अर्थ क्रांति या विद्रोह होता है। यह आंदोलन केवल अंग्रेजी शासन के विरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आदिवासी समाज के सामूहिक संघर्ष का प्रतीक भी बना। इतिहासकारों के अनुसार इस आंदोलन में 20 हजार से अधिक आदिवासियों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। आज भी यह दिन उनके अदम्य साहस और बलिदान की याद दिलाता है।
सभाओं में शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि
हूल दिवस के अवसर पर आयोजित सभाओं में समाज के लोगों ने अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। वक्ताओं ने कहा कि सिद्धो-कान्हू और उनके साथियों का संघर्ष केवल आदिवासी समाज तक सीमित नहीं था, बल्कि वह अन्याय और शोषण के खिलाफ पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। कार्यक्रम में सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और अपनी परंपराओं को संरक्षित रखने का भी संदेश दिया गया।
नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का प्रयास
कार्यक्रम के दौरान युवाओं से अपने इतिहास, संस्कृति और विरासत को जानने तथा उसे आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया। आयोजकों ने कहा कि हूल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, पहचान और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करने का अवसर भी है। इसी उद्देश्य से हर वर्ष इस आयोजन को उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।











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