Hul Diwas 2026: संथाल हूल के अमर नायकों सिदो-कान्हू की शहादत और उनके संघर्ष को याद करते हुए मंगलवार को बोकारो के चास स्थित आईटीआई मोड़ पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। यहां स्थापित सिदो-कान्हू की आदमकद प्रतिमा पर आजसू पार्टी के जिला अध्यक्ष सचिन महतो, कार्यकारी जिला अध्यक्ष अशोक महतो, अनिल झा, बंकू बिहारी सिंह, अभय शर्मा, राजेश सहित कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समाज के योगदान को याद करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।
नेताओं ने युवाओं को इतिहास से जोड़ने पर दिया जोर
श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सिदो-कान्हू, फूलो-झानो और संथाल हूल के अन्य वीरों का संघर्ष केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और स्वाभिमान की प्रेरणा है। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को इन महान सेनानियों के जीवन, त्याग और बलिदान की जानकारी मिलनी चाहिए। इसके लिए उनके संदेश को गांव-गांव और समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना है।

क्या है हूल दिवस का महत्व?
हर वर्ष 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। यह दिन वर्ष 1855 में शुरू हुए संथाल हूल विद्रोह की याद दिलाता है। ‘हूल’ संथाली भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है विद्रोह या क्रांति। यह आंदोलन अंग्रेजी शासन, जमींदारों और महाजनों के अत्याचार के खिलाफ आदिवासी समाज की संगठित आवाज था। इतिहासकार इसे 1857 की क्रांति से पहले अंग्रेजों के खिलाफ हुए सबसे बड़े जनआंदोलनों में शामिल मानते हैं।
अन्याय के खिलाफ उठी थी पहली बड़ी आवाज
उस दौर में आदिवासियों की जमीन पर कब्जा, अत्यधिक लगान, सूदखोरी और महिलाओं पर अत्याचार जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही थीं। इन हालात के विरोध में सिदो और कान्हू मुर्मू ने लोगों को संगठित किया और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। इस आंदोलन ने अंग्रेजी शासन की नींव को चुनौती दी और आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा दी।
शहादत की विरासत आज भी देती है प्रेरणा
इतिहास के अनुसार, 30 जून 1855 को भागनाडीह में हजारों संथालों ने अत्याचार के खिलाफ संघर्ष की शपथ ली थी। इसके बाद हुए संघर्ष में बड़ी संख्या में आदिवासी वीरों ने अपने प्राण न्योछावर किए, जबकि सिदो और कान्हू को अंग्रेजों ने फांसी दे दी। हूल दिवस उनके उसी अदम्य साहस, बलिदान और स्वाभिमान को याद करने का अवसर है, जो आज भी समाज को अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने की प्रेरणा देता है।











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