Bokaro: हर इंसान की जिंदगी में मुश्किलें आती हैं, लेकिन कुछ लोग उन्हीं मुश्किलों को अपनी ताकत बना लेते हैं। बोकारो जिले के ग्राम समीति गैरमजरूआ के वर्तमान ग्राम अध्यक्ष और झारखंड प्रजापति कुम्हार महासंघ प्रखंड समिति के संरक्षक भरत प्रजापति ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। 82 वर्ष की उम्र में भी वे जिस ऊर्जा और समर्पण के साथ समाज के बीच सक्रिय हैं, वह युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का विषय है। उनका जीवन बताता है कि सेवा का कोई निर्धारित समय या उम्र नहीं होती।
आर्थिक संकट ने रोकी पढ़ाई, लेकिन नहीं टूटा हौसला
16 जून 1945 को जन्मे भरत प्रजापति के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब वर्ष 1960 में उनके पिता का निधन हो गया। उस समय वे आठवीं कक्षा के छात्र थे। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो गई कि आगे की पढ़ाई जारी रखना संभव नहीं रहा। स्कूल से प्रमाण पत्र लेने के लिए भी 15 रुपये की जरूरत थी।

इतनी छोटी-सी रकम जुटाने के लिए उन्होंने खुद मेहनत की। 75 पैला चूड़ा ढेकी में कूटकर जारंगडीह के संडे बाजार में बेचा और उसी कमाई से स्कूल का प्रमाण पत्र प्राप्त किया। इसके बाद रोजगार कार्यालय में अपना नाम दर्ज कराया, जिसने आगे चलकर उनकी जिंदगी बदल दी।
16 साल की उम्र में विवाह, फिर नौकरी से मिली नई पहचान
वर्ष 1961 में महज 16 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ। इसी दौरान रोजगार कार्यालय के माध्यम से आईईएल कंपनी में पियून के पद पर नियुक्ति मिली। अपनी मेहनत, अनुशासन और ईमानदारी के दम पर उन्होंने केवल 28 दिनों में ही कंपनी के डेटोनेटर विभाग में स्थान हासिल कर लिया।
उन्होंने पूरी सेवा अवधि उसी विभाग में कार्य करते हुए सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्ति ली। उनका मानना है कि किसी भी काम को छोटा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि मेहनत हमेशा नई राह खोलती है।
समाज सेवा को बनाया जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य
नौकरी के साथ-साथ भरत प्रजापति ने समाज के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। वे वर्षों से सामाजिक और पारिवारिक विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने का प्रयास करते रहे हैं। उनका मानना है कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत आपसी एकता और भाईचारा होता है।
इसी सोच के साथ उन्होंने लोगों को जोड़ने का काम किया और कई परिवारों के बीच आपसी विश्वास कायम करने में अहम भूमिका निभाई।
मानव सेवा के कई प्रेरक उदाहरण
भरत प्रजापति का सामाजिक योगदान केवल सलाह देने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने जरूरतमंद परिवारों के साथ हर सुख-दुख में खड़े होकर जिम्मेदारी निभाई।
उनके प्रमुख सामाजिक कार्य:
- 16 युवक-युवतियों के विवाह संपन्न कराने में सक्रिय सहयोग।
- 18 दिवंगत लोगों के परिजनों के साथ प्रयागराज, काशी और वाराणसी में अस्थि विसर्जन में सहभागिता।
- 42 लोगों के अंतिम संस्कार में शामिल होकर मानवीय जिम्मेदारी निभाई।
- वर्षों से सामाजिक विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास।
‘जब तक जियो, तब तक सियो’ बना जीवन का मूल मंत्र
भरत प्रजापति कहते हैं कि इंसान का जीवन तभी सार्थक है, जब वह दूसरों के काम आए। उनका प्रिय वाक्य “जब तक जियो, तब तक सियो” उनके पूरे जीवन का सार है। उनका कहना है कि जब तक शरीर में ताकत है, तब तक समाज और मानवता की सेवा करते रहना ही उनका सबसे बड़ा लक्ष्य रहेगा।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज जब समाज में स्वार्थ की भावना बढ़ती दिखाई देती है, ऐसे समय में भरत प्रजापति का जीवन युवाओं को यह संदेश देता है कि कठिन परिस्थितियां सफलता की राह नहीं रोक सकतीं। गरीबी, संघर्ष और जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने न केवल अपना जीवन संवारा, बल्कि समाज को भी लगातार कुछ लौटाने का प्रयास किया। 82 वर्ष की आयु में भी उनकी सक्रियता यह साबित करती है कि सेवा की भावना ही किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान होती है।










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