Parasnath Controversy: झारखंड के प्रसिद्ध पारसनाथ पर्वत को लेकर धार्मिक अधिकार और आस्था का विवाद एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। पर्वत की धार्मिक पहचान, पूजा-पद्धति और वहां की व्यवस्थाओं को लेकर जैन संगठन और आदिवासी संगठन आमने-सामने हैं। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी मांगों को लेकर केंद्र और झारखंड सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। साथ ही मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन शुरू करने की चेतावनी भी दी है।
आदिवासी संगठन ने पारसनाथ को बताया मरांग बुरु

मरांग बुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष फागू बेसरा ने जैन संगठन की ओर से पारसनाथ पर्वत को लेकर किए जा रहे दावों का विरोध किया है। रामगढ़ में उन्होंने कहा कि संथाल आदिवासी समाज के लिए पारसनाथ पहाड़ सदियों से पवित्र धार्मिक स्थल रहा है और इसे वे मरांग बुरु के रूप में पूजते आए हैं।
उनके अनुसार पहाड़ की चोटी पर मरांग बुरु जुग जाहेर थान तथा तलहटी में दिसोम मांझी थान जैसे पारंपरिक धार्मिक स्थल मौजूद हैं। उनका दावा है कि पारसनाथ का क्षेत्र सरकारी रिकॉर्ड में राजस्व गांव के रूप में दर्ज है और यहां आदिवासी समुदाय के कई टोले तथा पारंपरिक पूजा स्थल आज भी मौजूद हैं।
जैन समुदाय के दावे पर मोर्चा ने उठाए सवाल
मोर्चा का कहना है कि जैन समुदाय को न्यायालय के आदेश के तहत सीमित भूमि पर बने मंदिर में पूजा का अधिकार प्राप्त है। संगठन के मुताबिक इस अधिकार को पूरे पारसनाथ पर्वत पर धार्मिक स्वामित्व के दावे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
फागू बेसरा ने आरोप लगाया कि कुछ प्रशासनिक फैसलों से आदिवासी समुदाय के पारंपरिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने संविधान में दिए गए समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का हवाला देते हुए सरकार से पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा करने की मांग की।
आदिवासी संगठन की सरकार से प्रमुख मांगें
मोर्चा ने केंद्र और राज्य सरकार के साथ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष भी अपनी आपत्ति रखने की बात कही है। संगठन की प्रमुख मांगें हैं—
- पूरे पारसनाथ पहाड़ को संथाल आदिवासियों के धार्मिक स्थल मरांग बुरु के रूप में मान्यता दी जाए।
- आदिवासी समाज के पारंपरिक और प्रथागत धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
संगठन ने जैन समुदाय के पक्ष में जारी बताए जा रहे प्रशासनिक आदेशों की समीक्षा और उन्हें वापस लेने की मांग भी की है।
जैन संगठन ने सुरक्षा और धार्मिक अनुशासन पर जोर दिया
दूसरी ओर, विश्व जैन संगठन के अध्यक्ष संजय जैन ने पारसनाथ पर्वत पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा और धार्मिक वातावरण बनाए रखने के लिए कई व्यवस्थाएं लागू करने की मांग की है। उनका कहना है कि पर्वत क्षेत्र में आने वाले यात्रियों का पंजीकरण जरूरी होना चाहिए और प्रवेश मार्ग पर सुरक्षा जांच की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए।
उन्होंने पूरे पर्वत क्षेत्र में सीसीटीवी निगरानी, पुलिस चेक पोस्ट और सुरक्षा बलों की तैनाती की मांग रखी है। इसके अलावा धार्मिक स्थल की गरिमा बनाए रखने के लिए अश्लील वीडियो और रील बनाने, नशे के सेवन तथा अनधिकृत दुकानों पर रोक लगाने की बात कही गई है।
बाइक संचालन और असामाजिक गतिविधियों पर रोक की मांग
जैन संगठन ने पर्वत क्षेत्र में बाइक के संचालन पर रोक लगाने की मांग भी उठाई है। संगठन का कहना है कि धार्मिक स्थल की शांति और पवित्रता को देखते हुए वहां ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण होना चाहिए, जिससे यात्रियों और श्रद्धालुओं को परेशानी होती है।
संजय जैन (Sanjay Jain) के मुताबिक इन मांगों को लेकर 27 अगस्त 2026 को केंद्र सरकार के वन मंत्रालय, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और झारखंड सरकार को पत्र सौंपा गया है। संगठन ने अपनी मांगों को लिखित रूप में सरकार के सामने रखा है।
26 सितंबर से देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
जैन संगठन ने साफ किया है कि यदि उसकी मांगों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो 26 सितंबर 2026 से देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। संगठन ने इसके लिए केंद्र और झारखंड सरकार को जिम्मेदार ठहराने की बात कही है।
वहीं मरांग बुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा ने भी मांगें पूरी नहीं होने की स्थिति में लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है।
समय पर समाधान नहीं हुआ तो बढ़ सकता है विवाद
पारसनाथ पर्वत को लेकर दोनों धार्मिक संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगातार तेज होते जा रहे हैं। एक ओर जैन संगठन पर्वत की धार्मिक व्यवस्था, सुरक्षा और जैन आस्था से जुड़े प्रबंधन की मांग उठा रहा है, तो दूसरी ओर आदिवासी संगठन अपने पारंपरिक धार्मिक अधिकार और मरांग बुरु की पहचान को लेकर मुखर है।
ऐसे में पूरे मामले पर केंद्र और झारखंड सरकार के स्तर से समय रहते स्पष्ट और संतुलित पहल नहीं हुई तो आने वाले दिनों में विवाद और गहरा सकता है। दोनों पक्षों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी होने के कारण प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसी भी टकराव की स्थिति को रोकते हुए सभी पक्षों के अधिकार और परंपराओं के बीच संतुलन कायम करना होगी।










