रायबरेली शहर में सोमवार सुबह उस समय राजनीतिक माहौल अचानक गर्मा गया, जब पुलिस लाइन चौराहा सहित कई प्रमुख स्थानों पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ लगाए गए विवादित पोस्टरों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगीं। पोस्टरों में सपा, यादव समाज और कथित ‘यादववाद’ को निशाना बनाते हुए कई तीखी और आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखी गई थीं। मामला सामने आते ही सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी फैल गई और इसे जिले की राजनीति को भड़काने की कोशिश बताया जाने लगा।
रातों-रात लगे पोस्टरों ने बढ़ाया विवाद
स्थानीय लोगों के मुताबिक, ये पोस्टर रात के अंधेरे में शहर के कई सार्वजनिक स्थलों, चौराहों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में लगाए गए। सोमवार सुबह करीब आठ बजे इनके फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे, जिसके बाद मामला तेजी से फैल गया। पोस्टरों की भाषा और उनमें इस्तेमाल किए गए नारों को लेकर सपा समर्थकों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि सामाजिक आधार पर भड़काऊ माहौल तैयार करने की कोशिश है।

पोस्टरों में क्या लिखा था, क्यों बढ़ा बवाल
विवादित पोस्टरों में कई ऐसे नारे और लाइनें लिखी गई थीं, जिन्हें समाजवादी पार्टी के नेताओं ने अपमानजनक और उकसाऊ बताया। एक पोस्टर में “लाल टोपी, साइकिल निशान, यादव वाद इनकी पहचान” लिखा गया था। इसके साथ एक समाचार चैनल की कटिंग भी लगाई गई थी, जिसमें यूपीएससी के तत्कालीन चेयरमैन अनिल यादव की नियुक्ति से जुड़ी खबर दिखाई गई।
दूसरे पोस्टरों में “सिपाही हो या लेखपाल, एक जाति हुई मालामाल” और “पीएफ है नाम का भाई, यादव वाद है अपनी कमाई” जैसे नारे लिखे गए थे। कुछ पोस्टरों में पुराने विवादों और राजनीतिक घटनाओं का हवाला देकर सपा नेतृत्व को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश भी की गई।
सपा कार्यकर्ताओं ने बताया साजिश, कार्रवाई की मांग
पोस्टरों के वायरल होने के बाद समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे पूरी तरह से सुनियोजित राजनीतिक साजिश करार दिया। उनका आरोप है कि इस तरह के पोस्टर लगाकर न केवल सपा की छवि खराब करने की कोशिश की गई, बल्कि समाज में जातीय तनाव और राजनीतिक वैमनस्य फैलाने का प्रयास भी हुआ है।
सपा कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से मांग की है कि पोस्टर लगाने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ तत्काल मुकदमा दर्ज किया जाए। साथ ही, जिन स्थानों पर ये पोस्टर लगाए गए हैं, वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालकर दोषियों तक पहुंचने की कार्रवाई की जाए।
प्रशासन की चुप्पी से बढ़े सवाल
मामले को लेकर शहर में चर्चा का सबसे बड़ा विषय यह है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर पोस्टर किसने और किस मकसद से लगाए। लोगों का कहना है कि पुलिस लाइन चौराहा जैसे संवेदनशील और व्यस्त इलाके में पोस्टर लग जाना सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
फिलहाल पुलिस या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यही वजह है कि सियासी गलियारों में अटकलें और तेज हो गई हैं। विपक्षी दलों के समर्थक भी इस पूरे घटनाक्रम को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।
CCTV जांच से खुल सकता है राज
स्थानीय नागरिकों और व्यापारियों का मानना है कि यदि पुलिस गंभीरता से जांच करे तो पोस्टर लगाने वालों तक पहुंचना मुश्किल नहीं होगा। शहर के प्रमुख चौराहों, बाजारों और सरकारी दफ्तरों के आसपास लगे कैमरे इस मामले में अहम सुराग दे सकते हैं।
जानकारों का कहना है कि यह सिर्फ पोस्टरबाजी का मामला नहीं, बल्कि चुनावी माहौल से पहले राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश भी हो सकती है। ऐसे में प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल रायबरेली में यह मामला सियासी बहस का केंद्र बन चुका है। समाजवादी पार्टी चाहती है कि इसे केवल पोस्टर विवाद न मानकर सामाजिक सौहार्द से जुड़ा मामला समझा जाए। वहीं आम लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर रातों-रात शहर की दीवारों और चौराहों तक ये पोस्टर पहुंचे कैसे।
अब देखना यह होगा कि पुलिस इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरू करती है या सपा की शिकायत के बाद औपचारिक कार्रवाई आगे बढ़ती है। इतना तय है कि अखिलेश यादव विरोधी इन पोस्टरों ने रायबरेली की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।










