Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के विद्युत विभाग में सिविल निर्माण कार्यों से जुड़े ठेकेदारों के समय-वृद्धि (टाइम एक्सटेंशन) के प्रकरणों के लंबे समय से लंबित रहने का मामला अब ऊर्जा मंत्री तक पहुंच गया है। मुख्य अभियंता, विद्युत सिविल ट्रांसमिशन-द्वितीय, लखनऊ के कार्यक्षेत्र में अधिकांश प्रकरण करीब तीन वर्षों से लंबित बताए जा रहे हैं। वहीं, शिकायत में कुछ मामले वर्ष 2019 से भी लंबित होने का दावा किया गया है। इससे विभागीय कार्यप्रणाली, जवाबदेही और प्रकरणों के निस्तारण में कथित असमानता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस संबंध में ऊर्जा मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार को शिकायत भेजकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और लंबित प्रकरणों की उच्चस्तरीय समीक्षा कराने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि समय-वृद्धि की स्वीकृति नहीं मिलने के कारण संबंधित ठेकेदारों को आर्थिक कठिनाइयों, वित्तीय नुकसान और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लंबे समय से निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे ठेकेदारों के सामने संविदात्मक दायित्वों और वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।

दूसरे जोनों में मंजूरी, यहां लंबित प्रकरणों पर सवाल
शिकायत में कहा गया है कि निदेशक (कार्य एवं परियोजना) की ओर से अन्य जोनों के समय-वृद्धि संबंधी प्रकरणों को स्वीकृति प्रदान की गई है, जबकि मुख्य अभियंता, विद्युत सिविल ट्रांसमिशन-द्वितीय, लखनऊ के कार्यक्षेत्र में केवल कुछ प्रकरणों को मंजूरी मिली है। अधिकांश मामले अब भी लंबित बताए जा रहे हैं।
शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि जब अन्य जोनों में समय-वृद्धि के प्रकरणों पर निर्णय लिया जा रहा है, तो इस कार्यक्षेत्र में समान प्रकृति के मामलों का वर्षों तक निस्तारण क्यों नहीं हो पा रहा है। यदि प्रकरणों की परिस्थितियां और अनुबंधीय शर्तें समान हैं, तो उनके निस्तारण में अंतर के कारणों की जांच होनी चाहिए। हालांकि, इस संबंध में विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।
कुछ को राहत, बाकी ठेकेदार इंतजार में
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ ठेकेदारों के समय-वृद्धि प्रकरण स्वीकृत कर दिए गए, जबकि अन्य ठेकेदारों के मामले अब तक लंबित हैं। इस कथित अंतर को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि प्रत्येक प्रकरण का निस्तारण संबंधित अनुबंध की शर्तों, कार्य की वास्तविक परिस्थितियों और विभागीय नियमों के आधार पर किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी ठेकेदार के साथ भेदभाव की स्थिति न बने।
वर्षों की देरी से बढ़ रही आर्थिक परेशानी
समय-वृद्धि के प्रकरणों का लंबे समय तक लंबित रहना निर्माण कार्यों से जुड़े ठेकेदारों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। शिकायत के मुताबिक, निर्माण कार्यों में लगाए गए संसाधनों की लागत, वित्तीय दायित्वों और अन्य संविदात्मक जिम्मेदारियों के बीच ठेकेदारों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। कुछ मामले वर्ष 2019 से लंबित होने का दावा इस समस्या की गंभीरता को और बढ़ाता है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि किसी प्रकरण में दस्तावेज या अन्य औपचारिकताएं अधूरी हैं, तो संबंधित पक्ष को समय रहते इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई और यदि प्रकरण निर्णय के लिए तैयार हैं, तो उन पर समयबद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों का जवाब विभागीय समीक्षा और अभिलेखों की जांच से ही सामने आ सकता है।
ऊर्जा मंत्री से पांच प्रमुख मांगें
ऊर्जा मंत्री को भेजे गए शिकायती पत्र में पांच प्रमुख मांगें रखी गई हैं। इनमें मुख्य अभियंता, विद्युत सिविल ट्रांसमिशन-द्वितीय, लखनऊ के कार्यक्षेत्र में लंबित सभी समय-वृद्धि प्रकरणों की कार्यवार समीक्षा, अन्य जोनों में स्वीकृत मामलों से तुलनात्मक परीक्षण और प्रकरणों के लंबित रहने के कारणों की जांच शामिल है।
इसके अलावा, जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है, उनकी जवाबदेही तय करने, नियमानुसार पात्र मामलों का निष्पक्ष एवं पारदर्शी निस्तारण कराने तथा सभी प्रकरणों के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित करने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने यह भी आग्रह किया है कि संबंधित ठेकेदारों को उनके प्रकरणों में की गई कार्रवाई की लिखित जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
अब विभागीय कार्रवाई पर टिकी निगाहें
शिकायत के जरिए ऊर्जा मंत्री से मामले में उच्चस्तरीय हस्तक्षेप कर आवश्यक निर्देश जारी करने की अपील की गई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि जब कुछ प्रकरण वर्ष 2019 से लंबित बताए जा रहे हैं, तो केवल सामान्य समीक्षा के बजाय प्रत्येक मामले की स्थिति, देरी के कारण और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट की जानी चाहिए।
अब देखना होगा कि ऊर्जा विभाग इस शिकायत पर क्या कदम उठाता है और वर्षों से लंबित बताए जा रहे समय-वृद्धि के प्रकरणों के निस्तारण के लिए कोई ठोस समय-सीमा तय की जाती है या नहीं। फिलहाल, मामले में विभाग का आधिकारिक पक्ष और लंबित प्रकरणों की वास्तविक संख्या सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।










