Doctor Shortage in India: देश में बीमारियों और मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन डॉक्टरों की उपलब्धता उतनी तेजी से बढ़ती दिखाई नहीं दे रही। संसद में दिए गए ताज़ा आंकड़ों ने एक बार फिर इस गंभीर कमी की ओर ध्यान खींचा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा (JP Nadda) ने बताया कि भारत में सिर्फ एक डॉक्टर पर औसतन 811 नागरिक निर्भर हैं, जो स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते दबाव का संकेत है। एलोपैथिक और आयुष मिलाकर डॉक्टरों की कुल संख्या भले बढ़ी हो, लेकिन सक्रिय रूप से उपलब्ध डॉक्टरों के आंकड़े चिंताजनक हैं। सरकार ने इस संकट को दूर करने के लिए कई कदम उठाने का दावा किया है जिनमें मेडिकल कॉलेजों (Medical College) का विस्तार, पीजी छात्रों की तैनाती और ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास शामिल हैं। तो चलिए जानते हैं पूरा मामला क्या है…
डॉक्टरों की कमी का संकट कैसे बढ़ा/Doctor Shortage in India
भारत (India) में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रहा है। देश में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी, लेकिन उसके अनुपात में स्वास्थ्य संरचना का विस्तार उसी रफ्तार से नहीं हो पाया। हाल के वर्षों में संक्रमणजनित बीमारियों, जीवनशैली संबंधी रोगों और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी चुनौतियों ने मरीजों की संख्या को और बढ़ा दिया है। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और भी कमजोर है, जहां डॉक्टरों की तैनाती और उपलब्धता एक बड़ी समस्या बनी हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टरों की कमी का सीधा असर मरीजों की जांच, इलाज की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पर पड़ता है। यही वजह है कि भारत में डॉक्टर-पेशेंट रेशियो लंबे समय से राष्ट्रीय बहस का हिस्सा रहा है।

एक डॉक्टर पर 811 नागरिक
राज्यसभा में पूछे गए प्रश्न के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा (JP Nadda) ने बताया कि देश में 13,88,185 एलोपैथिक डॉक्टर और 7,51,768 आयुष (AYUSH) डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं। हालांकि, यदि माना जाए कि दोनों श्रेणियों में से केवल 80% डॉक्टर सक्रिय रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं, तो देश का डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:811 बैठता है। यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से काफी नीचे है। नड्डा ने यह भी बताया कि सरकार ने मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र का विस्तार किया है- मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 818 हो चुकी है, एमबीबीएस सीटें 51,348 से बढ़कर 1,28,875 और पीजी सीटें 31,185 से बढ़कर 82,059 तक पहुंच गई हैं। इसके बावजूद भी डॉक्टरों की वास्तविक उपलब्धता अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सरकार की ओर से उठाए गए कदम
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि सरकार ग्रामीण, पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है। जिला अस्पतालों से जुड़े 157 नए मेडिकल कॉलेजों में से 137 पहले ही शुरू हो चुके हैं। फैमिली एडॉप्शन प्रोग्राम को एमबीबीएस पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, जिसके तहत छात्रों को गांवों में रहकर परिवारों की स्वास्थ्य निगरानी करनी होती है। इससे टीकाकरण, पोषण, मासिक धर्म स्वच्छता, आयरन-फोलिक एसिड सपोर्ट और रोगों की रोकथाम की गतिविधियों पर सक्रिय निगरानी होती है। नड्डा ने यह भी बताया कि नई नीति विदेशी डॉक्टरों को अस्थायी रजिस्ट्रेशन देकर रिसर्च, प्रशिक्षण और वॉलंटरी सेवाओं की अनुमति देती है। सरकार के अनुसार इन प्रयासों से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिलेगी।
कैसे पूरा होगा डॉक्टरों की कमी का अंतर?
नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के जिला रेजीडेंसी कार्यक्रम के तहत मेडिकल कॉलेजों के दूसरे और तीसरे वर्ष के पीजी छात्रों को जिला अस्पतालों में तैनात किया जा रहा है। इससे विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी और मरीजों को बेहतर चिकित्सा मिल सकेगी। सरकार ने दूरस्थ क्षेत्रों में काम करने वाले डॉक्टरों के लिए हार्ड-एरिया भत्ते, सरकारी आवास और अन्य प्रोत्साहनों की भी व्यवस्था की है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल सीटों में बढ़ोतरी और नए कॉलेजों की स्थापना से भविष्य में डॉक्टरों की संख्या जरूर बढ़ेगी, लेकिन मौजूदा अंतर को पाटने के लिए निरंतर और मजबूत कदम जरूरी हैं। आने वाले वर्षों में यदि नीतियां प्रभावी रहीं, तो देश में डॉक्टरों की उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है।










