Salon: रायबरेली के सलोन थाना क्षेत्र से सरकारी अभिलेखों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करने वाला हैरान करने वाला मामला सामने आया है। एक ग्रामीण का आरोप है कि चुनावी रंजिश के चलते उसे सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया गया। रिकॉर्ड में मृत दिखाए जाने के बाद उसका राशन बंद हो गया और वह पिछले करीब ढाई वर्षों से खुद को जिंदा साबित करने के लिए अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगा रहा है।
पीड़ित का आरोप है कि उसने गांव के कोटेदार के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इसी चुनावी रंजिश के चलते कथित तौर पर उसके नाम को सरकारी अभिलेखों में मृत दर्शा दिया गया। इसके बाद उसे सरकारी राशन का लाभ मिलना बंद हो गया। पीड़ित का कहना है कि वह पूरी तरह स्वस्थ और जीवित है, लेकिन कागजों में मृत होने के कारण उसे सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में परेशानी उठानी पड़ रही है।

हाथ में तख्ती लेकर लगाई गुहार
अपनी समस्या को लेकर पीड़ित हाथ में तख्ती लेकर अधिकारियों के कार्यालय पहुंचा। तख्ती पर लिखा था—“साहब, मैं जिंदा हूं।” पीड़ित की इस गुहार ने पूरे मामले को चर्चा में ला दिया है। उसका कहना है कि वह लगातार संबंधित अधिकारियों से शिकायत कर रहा है, लेकिन करीब ढाई साल बीतने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है।
सरकारी रिकॉर्ड में जीवित व्यक्ति की मौत कैसे दर्ज हुई?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति वास्तव में जीवित है तो सरकारी अभिलेखों में उसे मृत कैसे दर्ज कर दिया गया? राशन व्यवस्था में किसी व्यक्ति की स्थिति बदलने से पहले क्या संबंधित स्तर पर सत्यापन नहीं किया गया? पीड़ित के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी दस्तावेजों और राशन वितरण व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पीड़ित ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, सरकारी अभिलेखों में अपना नाम सही कराने, राशन सुविधा तत्काल बहाल कराने तथा यदि किसी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई किए जाने की मांग की है।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले की जांच किस स्तर पर कराता है और जांच के बाद क्या कार्रवाई सामने आती है। फिलहाल पीड़ित की फरियाद यही है—“साहब, मैं जिंदा हूं, फिर सरकारी कागजों में मुझे मृत क्यों दिखाया गया?”










